कृषि बाज़ार सुधारों को सफल बनाने की आवश्यकता

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वैश्विक महामारी COVID-19 के कारण लगाए गए लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित किया है

कृषि बाज़ार सुधारों को सफल बनाने की आवश्यकता

संदर्भ 

वैश्विक महामारी COVID-19 के कारण लगाए गए लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित किया है, ऐसे में कृषि पुन: आर्थिक विकास के इंजन और महत्त्वपूर्ण उपशामक के रूप में चर्चा के केंद्र में आ गई है। आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत प्रतिबंधों को हटाने से कृषि में निज़ी निवेश को आकर्षित करने में सहूलियत हुई है। सरकार को अनाज, दलहन, तिलहन, प्याज और आलू के किसानों की विशेष मदद करनी चाहिये, जो निजी निवेश को हतोत्साहित करने वाले नीति शासन द्वारा प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं। 

सरकार द्वारा पारित नए अध्यादेशों से अंतर-राज्य व्यापार को सक्षम करने और अनुबंध खेती को बढ़ावा देने की उम्मीद है, जिससे किसानों को बड़ी सहायता प्राप्त होगी। कृषि में अनिश्चितताओं और जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सरकार की नीतिगत प्रयासों में अब फसल और पशुधन में जोखिम को समाप्त करने के उपायों में सुधार, बेहतर कृषि-रसद के आधुनिकीकरण और कृषि बाजारों के निकट, पर्याप्त भंडारण सुविधाओं के प्रावधान के साथ विपणन उपायों के लिये प्रभावी सरकारी हस्तक्षेप सुनिश्चित करने पर ध्यान केन्द्रित करना शुरू कर दिया है। 

कृषि में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता क्यों? 

  • भारतीय कृषि ने निर्वाह कृषि की अवधि से लेकर अधिशेष कृषि उत्पादन को बढ़ाने तक का लंबा सफर तय किया है। यह स्थिति पूरी तरह से कृषि आधारभूत ढाँचे के पारिस्थितिकी-तंत्र के विकास की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव का आह्वान करती है।
  • किसान को लाभकारी मूल्य पर अपनी उपज को बेचने के लिये पर्याप्त विकल्प उपलब्ध कराने, निर्बाध अंतर्राज्यीय  व्यापार, कृषि उत्पादों की ई-ट्रेडिंग के लिये एक रूपरेखा बनाने की दिशा में केंद्रीय विपणन कानून का निर्माण करने की आवश्यकता है।
  • उल्लेखनीय है कि भारत में कृषि क्षेत्र की गिरती साख का प्रमुख कारण भूमि विखंडन की स्थिति है। भूमि विखंडन के कारण न तो आशाजनक नतीजे ही प्राप्त हो पाए हैं और न ही कृषिगत उत्पादकता में वृद्धि हो पाई है। स्पष्ट रूप से इस स्थिति के संदर्भ में गंभीरता से विचार करने तथा इस समस्या का समाधान किये जाने की आवश्यकता है। 

कृषि क्षेत्र से संबंधित चुनौतियाँ

  • पूर्व में कृषि क्षेत्र से संबंधित भारत की रणनीति मुख्य रूप से कृषि उत्पादन बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित रही है जिसके कारण किसानों की आय में बढ़ोतरी करने पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।
  • विगत पचास वर्षों के दौरान हरित क्रांति को अपनाए जाने के बाद, भारत का खाद्य उत्पादन 3.7 गुना बढ़ा है जबकि जनसंख्या में 2.55 गुना वृद्धि हुई है, किंतु किसानों की आय वृद्धि संबंधी आँकड़े अभी भी निराशाजनक हैं।
    • ज्ञात हो कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्‍य निर्धारित किया है, जो कि इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है किंतु यह लक्ष्य काफी चुनौतिपूर्ण माना जा रहा है। 
  • लगातार बढ़ते जनसांख्यिकीय दबाव, कृषि में प्रच्छन्न रोज़गार और वैकल्पिक उपयोगों के लिये कृषि भूमि के रूपांतरण जैसे कारणों से औसत भूमि धारण (Land Holding) में भारी कमी देखी गई है। आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 1970-71 में औसत भूमि धारण 2.28 हेक्टेयर था जो वर्ष 1980-81 में घटकर 1.82 हेक्टेयर और वर्ष 1995-96 में 1.50 हेक्टेयर हो गया था।
  • उच्च फसल पैदावार प्राप्त करने और कृषि उत्पादन में निरंतर वृद्धि के लिये बीज एक महत्त्वपूर्ण और बुनियादी कारक है। अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का उत्पादन करना जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही महत्त्वपूर्ण है उन बीजों का वितरण करना किंतु दुर्भाग्यवश देश के अधिकतर किसानों तक उच्च गुणवत्ता वाले बीज पहुँच ही नहीं पाते हैं।
  • भारत का कृषि क्षेत्र काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है, प्रत्येक वर्ष देश के करोड़ों किसान परिवार बारिश के लिये प्रार्थना करते हैं। प्रकृति पर अत्यधिक निर्भरता के कारण कभी-कभी किसानों को नुकसान का भी सामना करना पड़ता है, यदि अत्यधिक बारिश होती है तो भी फसलों को नुकसान पहुँचता है और यदि कम बारिश होती है तो भी फसलों को नुकसान पहुँचता है। इसके अतिरिक्त कृषि के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन भी एक प्रमुख समस्या के रूप में सामने आया है और उनकी मौसम के पैटर्न को परिवर्तन करने में भी भूमिका अदा की है।
  • भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि विपणन व्यवस्था गंभीर हालत में है। यथोचित विपणन सुविधाओं के अभाव में किसानों को अपने खेत की उपज को बेचने के लिये स्थानीय व्यापारियों और मध्यस्थों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे उन्हें फसल का सही मूल्य प्राप्त हो पाता।

 

प्रभाव 

  • देश के कृषि क्षेत्र में विद्यमान विभिन्न चुनौतियों और समस्याओं के परिणामस्वरूप किसान परिवारों की आय में कमी होती है और वे ऋण के बोझ तले दबते चले जाते हैं। अंततः उनके समक्ष आत्महत्या करने के सिवाए कोई विकल्प नहीं बचता।
  • निम्न और अत्यधिक जोखिम वाली कृषि आय कृषकों की रुचि पर हानिकारक प्रभाव डालती है और वे खेती को छोड़ने के लिये मज़बूर हो जाते हैं।
  • कृषि उत्पादन में कमी का नकारात्मक प्रभाव  विनिर्माण उद्योग पर भी पड़ता है क्योंकि कृषि क्षेत्र विनिर्माण उद्योग के लिये पर्याप्त मात्र में कच्चा माल उपलब्ध कराता है।  
  • इससे देश में खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र के भविष्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

कृषि सुधार हेतु सरकारी प्रयास

  • राष्‍ट्रीय कृषि मंडी स्‍कीम
    • राष्‍ट्रीय कृषि मंडी स्‍कीम (ई-नाम) के तहत बेहतर मूल्‍य खोज सुनिश्‍चित करके, पारदर्शिता और प्रतियोगिता के माध्यम से कृषि मंडियों में क्रांति लाने की एक नवाचारी मंडी प्रक्रिया प्रारंभ की गई।
  • कृषि उपज और पशुधन विपणन (संवर्द्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2017
    • कृषि उपज और पशुधन विपणन (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2017 राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों द्वारा अपनाये जाने हेतु जारी किया गया। जिसमें ई-व्‍यापार, सब-यार्ड के रूप में गोदामों, शीत भंडारण की घोषणा, मंडी शुल्‍क एवं कमीशन प्रभार को तर्कसंगत बनाना तथा कृषि क्षेत्र में निजी मंडी जैसे सुधार शामिल हैं। 
  • पीएम-किसान योजना
    • प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना है जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 फरवरी, 2019 को लघु एवं सीमांत किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी।
    • इस योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपए की दर से प्रत्यक्ष आय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
  • पीएम- आशा योजना 
    • सरकार की किसान अनुकूल पहलों को बढ़ावा देने के साथ-साथ अन्नदाता के प्रति अपनी जवाबदेही को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2018 में एक समग्र योजना ‘प्रधानमंत्री अन्न्दाता आय संरक्षण अभियान’ (Pradhan Mantri Annadata Aay SanraksHan Abhiyan- PM-AASHA) प्रारंभ की थी।
    • नई समग्र योजना में किसानों के लिये उचित मूल्य सुनिश्चित करने की व्यवस्था शामिल है और इसके अंतर्गत आने वाले प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं-
      • मूल्य समर्थन योजना (Price Support Scheme-PSS)
      • मूल्य न्यूनता भुगतान योजना (Price Deficiency Payment Scheme- PDPS)
      • निजी खरीद एवं स्टॉकिस्ट योजना (Private Procurement Stockist Scheme- PPSS)

संभावित उपाय

  • कृषि क्षेत्र समावेशी विकास के लिये एक महत्त्वपूर्ण खंड है और अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन प्रदान करता है, खासकर तब जब अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन न कर रही हो।
  • कृषि व्यय और विकास चालकों में असमानता के मुद्दे को संबोधित किया जाना चाहिये। पशुधन और मत्स्य पालन क्षेत्र में उच्च विकास के बावजूद भी इन क्षेत्रों पर किये जाने वाला व्यय अपेक्षाकृत काफी कम है। अतः पशुधन और मत्स्य पालन क्षेत्र के योगदान को देखते हुए आवश्यक है कि इन क्षेत्रों पर होने वाले व्यय में वृद्धि की जाए।
  • कृषि में अनुसंधान और विकास पर खर्च को सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 0.40 प्रतिशत से बढ़ाकर 1 प्रतिशत किया जाना चाहिये।  कृषि अनुसंधान एवं विकास में नूतन प्रयोग करने की आवश्यकता है जिससे सूक्ष्म कृषि, उच्च पोषक और प्रसंस्करण किये जाने वाली किस्में, जलवायु प्रतिरोधक प्रौद्योगिकियाँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कृषि और बाजार परामर्शों के लिये  साइबर कृषि भौतिक प्रणालियाँ विकसित हो सके।
  • कृषि पर भारत की निर्भरता और जलवायु-प्रेरित आपदाओं को देखते हुए देशभर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ‘क्लाइमेट स्मार्ट विलेज’ (Climate Smart Villages) की अवधारण के कार्यान्वयन का विस्तार किया जाना चाहिये।
  • कृषि क्षेत्र से संबंधित आँकड़ों को एकत्र करने के लिये एक एजेंसी की स्थापना की जानी चाहिये। यह संस्था ​​लाभार्थियों की पहचान, सब्सिडी के बेहतर लक्ष्यीकरण और नीति निर्माण में सहायक हो सकती है।
  • भारतीय कृषि में आधुनिक उद्यमिता को अधिक से अधिक बढ़ावा देने के लिये कृषि स्टार्ट-अप्स प्रारंभ करने की आवश्यकता है। स्टार्ट-अप इंडिया योजना के तहत कृषिगत सेवाओं को बढ़ावा दिये जाने से जहाँ एक ओर किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने के संदर्भ में प्रोत्साहन प्राप्त होगा, वहीं इससे उनकी आय में वृद्धि भी होगी।
  • किसी भी क्षेत्र में सुधारों से संबंधित कार्यवाही की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से सरकारों की ही होती है। ज्ञात हो कि कृषि एक राज्य सूची का विषय है इसलिये केंद्र की भूमिका सीमित है। लेकिन जिस प्रकार GST को लागू करने में केंद्र-राज्यों के मध्य अभूतपूर्व सहयोग देखा गया है। ऐसा ही सहयोग कृषि क्षेत्र में भी अपेक्षित है। कृषि क्षेत्र में भी एकीकृत परिषद का निर्माण करके कृषि से संबंधित समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है। 

निष्कर्ष 

विदित है कि भारत में एक बड़ी कृषक आबादी निवास करती है। यदि यह क्षेत्र समस्याग्रस्त बना रहेगा तो भारत में पहले से ही मौज़ूद आर्थिक असमानता में और भी वृद्धि होगी तथा समग्र मांग में भी कमी आ सकती है जिसके परिणामस्वरुप आर्थिक वृद्धि भी नकरात्मक रूप से प्रभावित हो सकती है। लेकिन इन सब के बावज़ूद भारत में कृषि क्षेत्र में सुधार के लिये सरकारों द्वारा गंभीर प्रयास देखने को नहीं मिले है। अतीत में भूमि सुधार अधिनियम इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। अब समय की मांग है कि सरकारें इस क्षेत्र को भी गंभीरता से लें तथा एक ऐसी व्यापक रणनीति के आधार पर सुधारों को लागू करने का प्रयास करें जिससे इस क्षेत्र में ढाँचागत परिवर्तन लाया जा सके।

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