पृथ्वी शिखर सम्मेलन में 'संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन' (UNFCCC) और ‘संयुक्‍त राष्‍ट्र म

जैव विविधता शासन

संदर्भ:

पिछले दशकों में विकसित और विकासशील दोनों ही प्रकार के देशों में व्यापक जैव विविधता ह्रास देखने को मिला है। जैव विविधता में होने वाली इस तीव्र गिरावट ने इन देशों के बीच 'जैविक विविधता अभिसमय’ (Convention of Biological Diversity- CBD) जैसी वार्ताओं और समझौतों की एक शृंखला को जन्म दिया है। 

सीबीडी के माध्यम से पहली बार वैश्विक स्तर पर 'पर्यावरणीय नैतिकता' (Environmental Ethics) की नींव रखी गई, जिसके माध्यम से देशों के अधिकारों को उनके समुदायों के पारंपरिक ज्ञान तथा आनुवंशिक संसाधनों के आधार पर मान्यता दी गई ताकि उन्हें शोषण से बचाया जा सके।

सीबीडी के तहत दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए अधिकांश देशों द्वारा वर्ष 2010 में जापान में सीबीडी- नागोया पर हस्ताक्षर किये और नागोया प्रोटोकॉल को अपनाया गया, जिसका उद्देश्य सीबीडी के ‘निष्पक्ष और न्यायसंगत साझाकरण’ (Fair and Equitable Sharing प्रावधानों को प्रभावी बनाना था।

वार्ताओं और समझौतों की इस शृंखला के एक दशक के बाद भी दुनिया के अधिकांश जैव-प्रौद्योगिकी आधारित पेटेंटों पर विकसित देशों का स्वामित्त्व है, जबकि मेगा-बायोडायवर्सिटी  वाले अधिकांश देश विकासशील हैं। यह एक ऐसी ‘जैव विविधता शासन’ प्रणाली की आवश्यकता के महत्त्व को उजागर करता है जिसमें आनुवंशिक संसाधनों के ‘उचित और न्यायसंगत साझाकरण’ सुनिश्चित किया जा सके।

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जैव विविधता शासन (Biodiversity Governance): 

  • जैव विविधता शासन के माध्यम से सभी हितधारकों की नीति निर्धारण और निर्णयन प्रक्रिया में भागीदारी पर बल दिया जाता है ताकि एक प्रभावी, कानून के शासन पर आधारित तथा पारदर्शी प्रणाली अपनाई जा सके, जो आनुवंशिक संसाधनों के निष्पक्ष और न्यायसंगत साझाकरण की गारंटी देता हो। 

वैश्विक स्तर पर जैव विविधता शासन:

  • वर्ष 1992 में रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में 'संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन' (UNFCCC) और ‘संयुक्‍त राष्‍ट्र मरुस्‍थलीकरण रोकथाम अभिसमय’ (UNCCD) के साथ ही 'जैव विविधता अभिसमय' (CBD) को अपनाया गया।
  • CBD को मुख्यतः तीन उद्देश्यों- जैविक विविधता का संरक्षण, इसके घटकों का स्थायी उपयोग और आनुवंशिक संसाधनों के ‘निष्पक्ष एवं न्यायसंगत साझाकरण’ के लिये डिज़ाइन किया गया था।
  • वर्ष 2010 में नागोया में CBD की कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (COP)-10 में वर्ष 2011-2020 हेतु ‘जैव विविधता के लिये रणनीतिक योजना’ को अपनाया गया। इसमें पहली बार विषय विशिष्ट 20 जैव विविधता लक्ष्यों- जिन्हें आइची जैव विविधता लक्ष्य के रूप में भी जाना जाता है, को अपनाया गया।
  • यह योजना संयुक्त राष्ट्र प्रणाली सहित संपूर्ण जैव विविधता प्रबंधन, संरक्षण और नीति तथा विकास कार्य में संग्लग्न अन्य सभी हितधारकों और भागीदारों के लिये जैव विविधता पर एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करती है।
  • वर्ष में 2010 में सभी पार्टियों द्वारा ‘राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीतियों और कार्य योजनाओं’ (National Biodiversity Strategies and Action Plans- NBSAPs) को वर्ष 2015 तक आइची लक्ष्यों के अनुरूप बदलने और इन्हें नीतिगत उपकरणों के रूप में अपनाने पर सहमति व्यक्त की गई थी।
    • जैव विविधता हेतु रणनीतिक योजना एवं इसके 20 ‘आइची लक्ष्यों’ (20 Aichi Targets) के अनुरूप ‘राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य-योजना (NBSAP)- 2008 को अद्यतन करने के लिये वर्ष 2011 में विशिष्ट विषय केंद्रित अंतर-मंत्रिस्तरीय बैठक एवं हितधारकों से व्यापक परामर्श किया गया।

भारत में जैव विविधता शासन:

  • भारत का 'जैविक विविधता अधिनियम' (Biological Diversity Act)- 2002, नागोया प्रोटोकॉल के उद्देश्यों के अनुरूप है।
  • इस अधिनियम को भारत में जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में देखा गया था, क्योंकि इसमें प्राकृतिक संसाधनों पर देशों के संप्रभु अधिकारों को मान्यता दी गई थी।
  • अधिनियम के माध्यम से स्थानीय आबादी तक ‘पहुँच और लाभ साझाकरण’ (Access and Benefit Sharing-ABS) पर बल दिया गया।
  • अधिनियम के माध्यम से विकेंद्रीकृत तरीके से जैव संसाधनों के प्रबंधन के मुद्दों का समाधान का प्रयास किया गया।
  • अधिनियम के तहत त्रि-स्तरीय संरचनाओं की परिकल्पना की गई है: 
    • राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA)।
    • राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड (SSB)। 
    • स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (BMCs)।
  • अधिनियम सक्षम अधिकारियों के विशिष्ट अनुमोदन के बिना भारत में उत्पन्न ‘आनुवंशिक सामग्री के हस्तांतरण’ (Transfer of Genetic Material) पर प्रतिबंध लगाता है।
  • अधिनियम जैव विविधता से संबंधित ज्ञान पर बौद्धिक संपदा का दावा करने वाले किसी भी व्यक्ति के संबंध में देश के पक्ष को मज़बूत करता है।

जैव विविधता शासन से संबद्ध मुद्दे:

कृषि और पारंपरिक प्रथाओं का बहिष्करण: 

  • नागोया प्रोटोकॉल के अनुसार, प्रत्येक भागीदार देश खाद्य सुरक्षा और कृषि के लिये  आनुवंशिक संसाधनों के महत्त्व एवं भूमिका से संबंधित मुद्दों पर विचार करेगा।
  • इस प्रकार पारंपरिक कृषि और प्रथाओं को लाभ एवं साझाकरण के दायरे से छूट दी गई है। इसके कारण भारत अपने आनुवंशिक संसाधनों और संबद्ध पारंपरिक ज्ञान के दुरुपयोग या जैव-चोरी (Bio-piracy) का शिकार हुआ है। इसके प्रमुख उदाहरणों में नीम और हल्दी शामिल हैं।
  • इसके अलावा किसानों के  पारंपरिक बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा बाहरी एजेंसियों से कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।

पारंपरिक प्रजनन प्रणाली का क्षरण:

  • बढ़ते औद्योगीकरण के साथ-साथ व्यावसायिक कृषि और अधिक कुशल नस्लों की मांग भी बढ़ी है। इसके कारण धीरे-धीरे पारंपरिक प्रजनन प्रणाली (Traditional Breeding Systems) का क्षरण हो रहा है, जिससे कृषि जैव विविधता में कमी आई है। 
  • इसके अलावा प्राचीन प्रजनन प्रणालियों से जुड़े पारंपरिक ज्ञान में भी लगातार कमी देखी गई है।

पशु आधारित आनुवंशिक संसाधनों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं:

  • फसल आधारित आनुवांशिक संसाधनों तक पहुँच को नागोया प्रोटोकॉल के तहत शामिल नहीं किया गया है परंतु इसे ‘खाद्य और कृषि से संबंधित पादप आनुवंशिक संसाधन पर अंतर्राष्ट्रीय संधि’ (International Treaty on Plant Genetic Resources for Food and Agriculture) के तहत संरक्षित किया गया है।
  • हालाँकि पशु आनुवंशिक संसाधनों के लिये ऐसी कोई प्रणाली नहीं अपनाई गई है।

पारंपरिक ज्ञान को मान्यता नहीं: 

  • स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण में मुख्य बाधा पारंपरिक ज्ञान की  मान्यता का अभाव और स्थानीय समुदायों के ज्ञान की रक्षा के खिलाफ कानूनी संरक्षण की कमी है।

‘खाद्य और कृषि संबंधित पादप आनुवंशिक संसाधन पर अंतर्राष्ट्रीय संधि’ (ITPGRFA): 

  • ITPGRFA जिसे ‘अंतर्राष्ट्रीय बीज संधि’ (International Seed Treaty) के रूप में जाना जाता है, CBD के साथ एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
  • इसका उद्देश्य खाद्य और कृषि के लिये दुनिया के पादप आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण, विनियमन और स्थायी उपयोग के माध्यम से खाद्य सुरक्षा की गारंटी देना तथा इसके उपयोग से प्राप्त होने वाले लाभ को उचित और समान  रूप से साझा करना है।

आगे की राह:

कृषि समाज को प्रोत्साहन: 

  • परंपरागत रूप से भारत में अधिकांश कृषक समाजों की फसल संरक्षण प्रणालियाँ उनके सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था के साथ एकीकृत हैं। इससे इन प्रजातियों के संरक्षण में मदद मिलती है। अत: ऐसे कृषक समाजों की कृषि प्रणालियों के संवर्द्धन और संरक्षण की आवश्यकता है।

अंतर्राष्ट्रीय संधियों का एकीकरण: 

  • नागोया प्रोटोकॉल के ‘पहुँच और लाभ साझाकरण’ (ABS) जैसे प्रावधानों का स्वतंत्र कार्यान्वयन संभव नहीं है, अत: इन्हें अन्य अंतर्राष्ट्रीय संधियों के साथ लागू किया जाना चाहिये।
  • ‘खाद्य और कृषि से संबंधित पादप आनुवंशिक संसाधन पर अंतर्राष्ट्रीय संधि’ (ITPGRFA) और ‘पहुँच तथा लाभ साझाकरण’ के बीच समन्वय के लिये इनके विधायी, प्रशासनिक और नीतिगत उपायों पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है।

पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (PBR):

  • PBR में जैव विविधता संसाधनों की स्थिति, उपयोग, इतिहास, हो रहे परिवर्तनों और लोक ज्ञान तथा  इन संसाधनों को किस प्रकार प्रबंधित किया जा सकता है इसके बारे में लोगों की धारणाओं का दस्तावेज़ीकरण किया जाना चाहिये।
  • PBR किसानों और समुदायों के अधिकारों को संरक्षित करने में उपयोगी हो सकता है।

औद्योगिक संबद्धता: 

  • ABS जैसे प्रावधानों का ‘कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी’ (CSR) जैसे कानूनों के साथ एकीकरण उन उद्योगों के लिये फायदेमंद हो सकता है जो जैविक संसाधनों के उपयोग से अर्जित लाभ को स्थानीय समुदायों के साथ साझा करना चाहते हैं।

निष्कर्ष:

  • भारत एक प्रमुख मेगा-बायोडायवर्सिटी वाला देश है। भारत में वनस्पतियों और जीवों से संबंधित आनुवंशिक संसाधनों का विशाल भंडार मौज़ूद है। इसलिये मानव जाति के विकास तथा उपलब्ध संसाधनों के एकीकरण का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।
  • जैव विविधता शासन को इस प्रकार सुनिश्चित किया जा सके  जिससे जैव संसाधनों के ज्ञान का लाभ पारंपरिक समुदायों को प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त हो सके।

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